
मुंबई ( युनिस खान ) भांडुप के खिड़ीपाड़ा में खानकाह महफ़िल मंन्सूरिया में हर साल की तरह इस वर्ष भी ईद मिलादुन्नबी के अवसर पर मुबारक और तबर्रुक़ात की रूहानी महफ़िल का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम हज़रत सूफ़ी अब्दुल नईम अता शाह क़ादरी चिश्ती अबुल-उलाई दामत बरकातहुं की सरपरस्ती में संपन्न हुआ। जिसमें बड़ी संख्या में उलमा-ए-किराम, सूफ़िया-ए-अज़ाम, मुरीदीन, मुतक़िदीन और मर्द-ओ-ख़्वातीन शामिल हुए। ज़ियारत के लिए पुरुषों और महिलाओं की अलग-अलग क़तारें लगाई गईं। ज़ियारत करते समय उपस्थित आशिक़ान-ए-रसूल का जोश-ओ-ख़रूश देखने लायक़ था। महफ़िल में नात-ए-पाक पेश की गईं। इस मौक़े पर सूफ़ी अब्दुल नईम अता शाह ने अपने विचार रखते हुए कहा कि पिछले 22 वर्षों से माह-ए-नूर की छठी पर यहां ज़ियारत-ए-मुए मुबारक का एहतिमाम किया जाता है। हर साल ज़ायरीन की तादाद बढ़ती जा रही है। यह जलसा न सिर्फ़ इश्क़-ए-रसूल की अलामत है बल्कि मोहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम भी देता है।
महफ़िल में हज़रत मोहम्मद के मुए मुबारक, ज़ुल्फ़-ए-अनवर, कमली-ए-मुबारक का टुकड़ा, ग़िलाफ़-ए-काबा, रोज़ा-ए-अनवर के ग़िलाफ़ का टुकड़ा, हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ रज़ि, हज़रत अली रज़ि, हज़रत इमाम हसन रज़ि, हज़रत इमाम हुसैन रज़ि के मुए मुबारक, बीबी फ़ातिमा रज़ि के चादर का हिस्सा और ग़ौस-ए-आज़म हज़रत अब्दुल क़ादिर जिलानी रज़ि के मुए मुबारक और ख़िर्क़ा मुबारक सहित अनेक नादिर तबर्रुक़ात की ज़ियारत भी कराई गई।
अंत में उपस्थित लोगों ने सलाम पेश किया। इसके बाद नईम मियाँ ने आलम-ए-इस्लाम और मुल्क में अमन-ओ-सलामती के लिए ख़ास दुआ की। दुआ के बाद लंगर-ए-रसूल का इंतज़ाम किया गया और रात देर तक चली दुआ के बाद यह रूहानी जलसा इख़्तिताम को पहुँचा।


