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पर्यावरण अनुकूल गणेशोत्सव का झूठा दिखावा बंद कर सच्ची जागरूकता फैलाएं – डॉ प्रशांत सिनकर 

ठाणे ( युनिस खान ) रंग-बिरंगी, रसायन-युक्त, पॉप-अप मूर्तियों का विसर्जन आज भी खाड़ियों के किनारे और तालाबों में किया जा रहा है। कृत्रिम तालाब बनाकर उनमें रखी मूर्तियों को वापस खाड़ियों में डाल दिया जाता है। पंथों या सामाजिक संगठनों की भागीदारी के बावजूद, सरकार का नियंत्रण कम होता जा रहा है। “पर्यावरण-अनुकूल” नाम के पीछे सिर्फ़ एक प्यारा सा मुखौटा लगाया जा रहा है – लेकिन पर्यावरण संरक्षण का मूल उद्देश्य ही खो गया है। इस आशय की बात पर्यावरण पत्रकार डॉ प्रशांत सिनकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस को लिखे में कहा है।
     उन्होंने कहा है कि आप राज्य का नेतृत्व जिम्मेदारी से कर रहे हैं और पर्यावरण मित्रता के प्रति आपका रुख हमेशा स्पष्ट और सकारात्मक रहा है। इसीलिए, एक जागरूक नागरिक और पर्यावरण पत्रकार होने के नाते, मैं आपके समक्ष अपने दिल की पीड़ा व्यक्त कर रहा हूँ। पिछले कुछ वर्षों से, राज्य सरकार, मनपा, नगर परिषद और कई सरकारी संस्थाएँ “पर्यावरण अनुकूल गणेशोत्सव” की आड़ में बड़े गर्व के साथ गतिविधियाँ चला रही हैं। लेकिन वास्तव में, इस अवधारणा का सार केवल प्रचार तक ही सीमित रह गया है।
       इसलिए, मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि “पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव” जैसे भ्रामक रूपक का प्रयोग बंद करें। इसके बजाय, एक विचारोत्तेजक, प्रेरक नाम का प्रयोग करें। जैसे सजग गणेशोत्सव, सुजान गणेशोत्सव, संस्कृति गणेशोत्सव, संपूर्ण शाश्वत गणेशोत्सव, निसर्गनिष्ठ गणेशोत्सव ये नाम न केवल मूर्तियों को, बल्कि गणेशोत्सव की समग्र सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय ज़िम्मेदारी को भी उजागर करेंगे। यह बदलाव लोगों के मन में नए विचार जगाएगा और पर्यावरण संरक्षण का सच्चा संदेश उन तक पहुँचेगा। हमने पर्यावरण के संबंध में कई निर्णायक निर्णय लिए हैं। मुझे आशा है कि आप भी इस छोटे लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दे पर गंभीरता से विचार करेंगे।
        बता दें कि डॉ सिनकर अपनी पत्रकारिता करते हुए जीव , जंतुओं और पर्यावरण संरक्षण ,संवर्धन को हमेशा प्रमुखता दी है। उनके विचार में मानव स्वास्थ्य ही नहीं जीव जंतुओं के संरक्षण का बड़ा महत्व रहा है। जलवायु परिवर्तन , प्रदूषण नियंत्रण , पर्यावरण संवर्धन व संरक्षण पर बहुत कुछ लिखा। आज की व्यावसायिक पत्रकारिता के युग में डॉ सिनकर ने पर्यावरण को चुना। इसके लिए कभी कभी वे अपने मित्रों की हँसी के पत्र बने और मुस्कुरा कर सुन लेते थे। वे अपने विचारों के अनुसार पर्यावरण के विषय में अपनी लेखनी चलते रहे। उन्हें देश विदेश में लोगों ने समझा और उनके इन्हीं कार्यों को देखते एक नहीं कई डॉक्टरेट की उपाधियों से सम्मानित भी किया।

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