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एल नीनो, जलवायु परिवर्तन से बचने के वन क्षेत्र बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों की समिति की मांग

ठाणे ( यूनिस खान ) जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और एल नीनो से राज्य में सुखा की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है। सरकारी रिकॉर्ड में वन जमीन के जो भी आंकड़े हो, जमीनी हकीकत में वन की कमी और बढ़ते प्रदूषण की वजह से बारिश में कमी से सुखा और पानी की समस्या बढ़ते जा रही है। इसका असर खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ रहा है। भाजपा राष्ट्रीय परिषद के पूर्व सदस्य ओमप्रकाश शर्मा ने कृषि, वन , जल संसाधन मंत्रालय से ठोस कदम उठाने की मांग किया है। उन्होंने कहा है कि इसके लिए भारतीय प्रशासनिक अधिकारियों की विभागीय स्तर पर समिति गठित की जाए, जो प्रदूषण रोकने और पर्यावरण संवर्धन व संरक्षण की कार्यवाही करे।
        वरिष्ठ भाजपा नेता शर्मा ने कहा है कि मैने 50 वर्षों के राजनीतिक जीवन में महाराष्ट्र के अनेक जिलों का दौरा कर कृषि , जल और जंगल का निरीक्षण किया है। उन्होंने अपने अनुभव को साझा करते हुए विशेषज्ञों की राज्य व विभाग स्तर पर समिति गठित की जाए। जन भागीदारी के लिए जनजागरण और प्रोत्साहन की नीति बनाने की जरूरत है। वृक्षारोपण करने वालों को प्रशस्ति पत्र दिया जाए। एल नीनो की भविष्यवाणी के बाद राज्य के एक तिहाई हिस्से में सूखे की स्थिति सामने है। एल नीनो अधिक प्रभावी होने से संकट बढ़ सकता है शहरी इलाकों पर जहां नागरिकों को पानी कटौती का सामना करने की समस्या है वहीं मौसम परिवर्तन से भी समस्या बढ़ रही है।
         शर्मा ने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए उद्योग आवश्यक है, लेकिन नए उद्योग को अनुमति देते समय प्रदूषण की रोकथाम के ठोस उपाय करना अत्यंत आवश्यक है। उद्योगों का सर्वे कर प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों का प्रदूषण कम करने के लिए विशेषज्ञों की समिति स्थापित कर रिपोर्ट तैयार की जाए। संबंधित विभाग और उद्योग क्षेत्र के लोगों के साथ मिलकर सकारात्मक पहल की जाय। उद्योग हमारे जीवन के लिए बहुत जरूरी है लेकिन उससे अधिक प्रदूषण रोकने और पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन के लिए उपाय करने की जरूरत है। उन्होंने कहा है कि वर्षा जल संरक्षण और नदी जोड़ो अभियान को सरकार द्वारा महत्व दिया जाये। भारतरत्न अटल बिहारी वाजपेयी की नदी जोड़ो महत्वाकांक्षी योजना है जिसे ईमानदारी पूर्वक कियान्वित किए जाने का सरकारों को निर्णय लेना चाहिए। इन उपायों से जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को कम करने के साथ ही पर्यावरण संवर्धन,संरक्षण में मदद मिलेगी।
       किसानों की आर्थिक सहायता करने में निधि निधि खर्च करनी पड़ती है। देश के अन्नदाता की संकट के समय मदद करना सरकारों का दायित्य है। वहीं इसका एक हिस्सा किसानों की स्थाई भलाई और उन्हें आधुनिक खेती के लिए प्रशिक्षण आदि पर खर्च की व्यवस्था की जाए। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर समय रहने ठोस उपाय नहीं किए गए तो आगामी समय में समय और अधिक गंभीर होती जाएगी। इस लिए सरकारों को समय रहते प्रशासनिक अधिकारियों और विशेषज्ञों की समिति बनाकर इस विषय पर अध्ययन करने का निर्णय लेना चाहिए।

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