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आतंक को रोकना और कश्मीरी पंडितों के अधिकारों के लिए संघर्ष आवश्यक -ओमप्रकाश शर्मा 

ठाणे ( युनिस खान )कश्मीरी पंडितों के अधिकारों के लिए ठाणे से आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख समाजसेवी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राष्ट्रीय परिषद के पूर्व सदस्य ओम प्रकाश शर्मा ने उस संघर्ष को याद करते हुए कहा कि न्याय के लिए आंदोलन 1952 में शुरू हुआ और आज भी जारी है। पहलगांव की आतंकी हमले में करीब 27 पर्यटकों की हुई हत्या की घटना बहुत ही शर्मनाक और निंदनीय है, इसका हम घोर निषेध करते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर में शांति के लिए उठाए गए कदमों से बहुत सुधार आया है इसके बावजूद पड़ोसी राष्ट्र पाकिस्तान आतंक की छिट पुट घटनाओं को अंजाम देने का घिनौना कार्य कने में लगा है। उसने अपनी आतंकी गतिविधियों को बंद नहीं किया तो उसे मुंह तोड़ जवाब देना पड़ेगा।
        सत्याग्रह आंदोलन में अपनी भागीदारी के बारे में बताते हुए शर्मा ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के अधिकारों और सम्मान को सुरक्षित करने के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1952 में श्रीनगर में आंदोलन शुरू किया। कश्मीर का मुद्दा भारतीय जनसंघ के एजेंडे में था। भाजपा की स्थापना के बाद उसने अपने पांच प्रमुख मुद्दों में कश्मीर को अपने एजेंडे में रखा। हमारा नारा था , जहां शहीद हुए श्यामा प्रसाद मुखर्जी वह कश्मीर हमारा है। कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद पूरे देश में आंदोलन शुरु हुआ। महाराष्ट्र की ओर से 1987 में हुए डोंडा बचाओ आंदोलन का ठाणे जिले का नेतृत्व करने वाले शर्मा ने बताया कि हमें एयरपोर्ट गिरफ्तार का पाकिस्तान से 7 किमी दूरी पर बनी जेल में बंद कर दिया। तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष चमनलाल गुप्ता ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो 3 दिन बाद हमें पुलिस ने रिहा किया। चमनलाल गुप्ता ने कहा कि हम कश्मीरी खुद को अकेला समझ रहे थे आज आप सबके साथ आने हमें लगा कि हम हिंदुस्तान में ही हैं। पलायन कर रहे कश्मीरी पंडितों के लिए आरएसएस ने व्यवस्था किया था जहां से वे अपने करीबियों के जा रहे थे जिसमें अधिक संख्या दिल्ली जाने वालों की थी। आज भी करीब दो लाख कश्मीरी पंडित विस्थापित जीवन जीने के लिए मजबूर है।
        शर्मा ने कहा कि कश्मीर को भारत में पूरी तरह से एकीकृत करने की मांग के साथ प्रतिरोध के बीज बोए गए थे। शर्मा ने कहा कि मुखर्जी का प्रतिष्ठित नारा “एकजुट भारत के लिए साझा एजेंडा” आज भी राष्ट्रवादी हलकों में गूंजता है। उन्होंने कहा, “हजारों कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया, उनके घर जला दिए गए और दशकों से उनका जीवन उजड़ गया।” 1988 की एक बड़ी घटना को याद करते हुए शर्मा ने कहा कि वह ‘डोडा बचाओ, कश्मीरी पंडित बचाओ’ के बैनर तले गोपीनाथ मुंडे के नेतृत्व में महाराष्ट्र से आए एक  विशेष  प्रतिनिधि मंडल का हिस्सा थे। समूह ने जम्मू में आंदोलन किया और सुषमा स्वराज सहित केंद्रीय भाजपा नेताओं ने उनका साथ दिया। शर्मा ने जोर देकर कहा कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है और उन्होंने नई पीढ़ी से न्याय और एकीकरण की मशाल को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

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