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 लगभग 70% हार्ट अटैक समय पर इलाज नहीं मिलने की वजह से

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, पिछले पंद्रह सालों या उससे अधिक अवधि के दौरान भारत में लगभग 21% महिलाएँ और 24% पुरुष उच्च रक्तचाप की समस्या से पीड़ित हैं

भारत में 39% महिलाएँ और 49% पुरुष उच्च-रक्तचाप की समस्या से ग्रस्त होने की कगार पर हैं

मुंबई [ अमन न्यूज नेटवर्क ] न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स के पैनल में शामिल विशेषज्ञों ने उच्च रक्तचाप एवं दिल का दौरा के विषय पर आयोजित पैनल चर्चा के दौरान एक सुर में इस बात को दोहराया कि, दिल की सेहत को नियंत्रित रखने के लिए हमारे शरीर के महत्वपूर्ण संकेतों की निगरानी करना बेहद अहम है। लोगों को एम्बुलेटरी ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग (एबीपीएम) के लिए उपलब्ध विभिन्न गैजेट्स के माध्यम से घर पर नियमित रूप से अपने बीपी की निगरानी करनी चाहिए, फिर चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो और उनमें इसके लक्षण दिखाई दें अथवा नहीं। हालांकि पारंपरिक तौर पर कई अलग-अलग वजहों से लोगों को दिल के दौरे की संभावना होती है, लेकिन उच्च रक्तचाप दिल की सेहत पर बुरा असर डालने वाले प्रमुख कारकों में से एक है क्योंकि इससे शरीर की धमनियाँ प्रभावित होती हैं।

उच्च रक्तचाप की वजह से धमनी की दीवारों पर रक्त का दबाव लगातार बहुत अधिक होता है। इस खून को पंप करने के लिए को हमारे दिल को अधिक मेहनत करनी पड़ती है। धीरे-धीरे दिल पर लगातार पड़ने वाले दबाव की वजह से दिल की मांसपेशियाँ कमजोर हो सकती हैं और उनके काम करने की क्षमता घट सकती है। देर-सवेर इस अत्यधिक दबाव की वजह से दिल काम करना बंद करने लगता है।

डायबिटीज, कोलेस्ट्रॉल, अधिक देर तक बैठकर काम करने की आदत, बड़े अरमान और तनाव, शारीरिक व्यायाम नहीं करने की आदत, वायु प्रदूषण, धूम्रपान और अस्वास्थ्यकर भोजन के साथ-साथ हमारी जीवन-शैली भी दिल की बीमारियों के बढ़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

इस मौके पर डॉ. विवेक महाजन, कन्सल्टेंट इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पिटल, मुंबई ने कहा, “कुछ दवाएँ ऐसी होती हैं जो रक्तचाप की दवा के काम में बाधा डालती हैं, और आगे चलकर इनकी वजह से रक्तचाप बढ़ जाता है, जिसमें आईबुप्रोफेन और डाइक्लोफेनेक वाली पेन-किलर श्रेणी की कुछ दवाएँ शामिल हैं। उच्च रक्तचाप की समस्या उत्पन्न करने वाली दवाइयों के दूसरे समूह में जुकाम के लिए इस्तेमाल होने वाले नेजल ड्रॉप, गर्भनिरोधक गोलियाँ तथा यष्टिमधु एवं स्टेरॉयड युक्त आयुर्वेदिक दवाएँ शामिल हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “आजकल तो स्कूल जाने वाले बच्चे भी अधिक भोजन करने, असंतुलित जीवन-शैली, तथा खाने में सब्जियों एवं फलों की कमी जैसी वजहों से शुरुआती उच्च रक्तचाप से पीड़ित हो रहे हैं। इसलिए, इस आयु वर्ग के बच्चों को उच्च रक्तचाप की रोकथाम के बारे में जानकारी देने की सलाह दी जाती है, ताकि उन्हें भी बेहतर और सेहतमंद जिंदगी मिल सके।

मणिपाल हॉस्पिटल के व्हाइटफील्ड के कार्डियोलॉजी एवं इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी के कन्सल्टेंट –  डॉ. संदेश प्रभु ने कहा, “इस महामारी के दौरान हमने उच्च रक्तचाप के मामलों में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी देखी है, और सामान्य तौर पर घर से काम करना इसकी मुख्य वजह है। इसके चलते उच्च रक्तचाप के साथ-साथ कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज इत्यादि के मामलों में भी बढ़ोतरी हुई है।”

डॉ. प्रभु ने आगे कहा, “नवीनतम दिशानिर्देशों के अनुसार, अगर सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर 130 मिमी एचजी से ज्यादा हो और डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर 80 मिमी एचजी से ज्यादा हो, तो उसे उच्च रक्तचाप का चरण 1 माना जाता है।”

डॉ. अजीत के.एन., मेडिकल डायरेक्टर, क्लिनिकल एंड इमेजिंग सर्विसेज, न्यूबर्ग डायग्नोस्टिक्स, ने कहा, “हम सभी यह अच्छी तरह जानते हैं कि रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर होता है, और इसी वजह से समय-समय पर अपने रक्तचाप की जाँच करवाना बेहद जरूरी है, भले ही इसके कोई लक्षण दिखाई दें या नहीं। इस तरह की संतुलित जीवन शैली के साथ-साथ नमक के सेवन का ध्यान रखने, मौसमी फल खाने, गहरी नींद सोने, शरीर के आदर्श वजन को बनाए रखने और शारीरिक गतिविधियों से कोशिकाओं में नई जान डालने और रक्तचाप को रोकने में मदद मिलती है, जिससे आप हमेशा सेहतमंद रहते हैं।”

इतना ही नहीं, अगर कोई व्यक्ति रक्तचाप की दवाई ले रहा है और लंबे समय से उस बीपी स्थिर है, तो भी हमें दवा बंद नहीं करनी चाहिए, बल्कि उसे डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए तथा पैनल के विशेषज्ञों द्वारा दिए गए सुझाव के अनुसार दवाई की पावर अथवा डोज को कम करने के बारे में पूछना चाहिए। क्योंकि कई अलग-अलग वजह से भी ब्लड प्रेशर की रीडिंग कम हो सकती है और संभव है कि यह स्थिर नहीं हो।

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