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व्यवहार परिवर्तन के जरिए समाज में दूर की जा सकती है लैंगिक असमानता 

 एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज ऑफ इंडिया द्वारा लिंग समानता पर विशेषज्ञों ने रखी अपनी राय 

 मुंबई [ अमन न्यूज नेटवर्क ] अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज ऑफ इंडिया की ओर से ‘जेंडर इक्वेलिटी टुडे फॉर ए सस्टेनेबल टुमॉरो – ब्रेकिंग स्टीरियोटाइप्स’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में भाग लेने वाले पैनलिस्टों ने कहा कि बडे पैमाने पर व्यवहार परिवर्तन के जरिए लैंगिक असमानता को कम किया जा सकता है।

     व्यवहार परिवर्तन की शुरुआत लड़कियों और लड़कों के साथ समान व्यवहार करके, लड़कियों की शिक्षा में निवेश करके, उत्पादक रोजगार के लिए महिलाओं को कौशल प्रदान करके कौशल में निखार लाकर, श्रम शक्ति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करके और नेतृत्व के पदों पर अधिक महिलाओं को काबिज होने के लिए प्रोत्साहित करके जा सकती है।

      वर्चुअल पैनल चर्चा को संगठन के आधिकारिक फेसबुक हैंडल पर लाइव स्ट्रीम किया गया। चर्चा में शामिल पैनलिस्टों में एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज ऑफ इंडिया के महासचिव श्री सुमंत कर; उत्तराखंड सरकार की अतिरिक्त मुख्य सचिव आईएएस, सुश्री राधा रतूड़ी; संभागीय आयुक्त कार्यालय, दिल्ली की उपायुक्त आईएएस, सुश्री इरा सिंघल; डेलॉइट इंडिया की पार्टनर सुश्री नीरू आहूजा; एसओएस मदर सुश्री श्यामा जैन; परिवार सुदृढ़ीकरण कार्यक्रम की केयरगीवर सुश्री चंद्रम्मा शामिल थे। पैनलिस्टों ने अपने जीवन के सशक्तिकरण की यात्रा के बारे में बात की, जिसने एक प्रेरणा का काम किया। यह बातचीत महिलाओं के द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों पर केंद्रित थी।

      हालांकि भारत अपने संविधान के माध्यम से समानता की गारंटी देता है, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। लिंग असमानता के कारण लड़कियों के खिलाफ गंभीर भेदभाव किया जाता है, जो कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, बाल मृत्यु दर, शिक्षा तक पहुंच की कमी आदि जैसे विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। लैंगिक असमानता का समाधान परिवारों और समाज के माध्यम से किया जाना चाहिए, उन्हें लड़कियों की शिक्षा में निवेश करना चाहिए और उन्हें बेहतर भविष्य बनाने के लिए सशक्त बनाना चाहिए।

       उत्तराखंड सरकार की अतिरिक्त मुख्य सचिव आईएएस, सुश्री राधा रतूड़ी ने समाज से लैंगिक समानता की दिशा में काम करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “हमारे पास राजनीतिक समानता है। भारतीय संविधान महिलाओं के साथ समान व्यवहार करता है। हमें 1952 से चुनाव में वोट देने का अधिकार है। असली समस्या सामाजिक असमानता है।ʺ

        सुश्री रतूड़ी ने लड़कियों के साथ भेदभाव के बारे में विस्तार से बात की, चाहे वह कन्या भ्रूण हत्या हो या बाल विवाह। उन्होंने कहा, “बेटे और बेटियों में अभी भी बहुत अंतर है। समाज महिलाओं पर बेटे को जन्म देने के लिए दबाव डालता है, खासकर अगर वह दूसरा बच्चा है। भारत में 13 साल से कम उम्र की करीब 40 फीसदी लड़कियों की जबरन शादी करा दी जाती है। बाल विवाह के कारण मातृ मृत्यु दर अधिक है। सिर्फ लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाकर और समाज की सोच में परिवर्तन लाकर ही लिंग असमानता को खत्म किया जा सकता है। इसकी शुरुआत हमारे साथ करने की जरूरत है। महिलाओं में आत्मविश्वास विकसित करने की जरूरत है। हमें बोलना सीखना होगा।

       दिल्ली के संभागीय आयुक्त कार्यालय की उपायुक्त आईएएस, सुश्री इरा सिंघल ने महिलाओं को अपनी सीमाओं से बाहर आने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा, “एक महिला और दिव्यांग व्यक्ति के रूप में, मुझे कई पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा और मैंने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करना सीखा। मैं सीमाओं में विश्वास नहीं करती। यदि आप सीमाओं को स्वीकार नहीं करते हैं, तो आप बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं।” सुश्री सिंघल ने सिविल सेवा परीक्षा में टॉप करने वाली पहली दिव्यांग महिला बनने का गौरव हासिल किया है।

       एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज ऑफ़ इंडिया के महासचिव श्री सुमंत कर ने महामारी के दौरान महिलाओं के द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों के बारे में बात करके पैनल चर्चा की शुरुआत की। महिलाओं ने महामारी के दौरान बच्चों की देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महामारी के दौरान बच्चों की शिक्षा में एक ठहराव आ गया था और ऑनलाइन शिक्षा तक सीमित पहुंच के कारण, केयरगीवर्स और बच्चों दोनों के लिए यह एक कठिन समय था।

       उन्होंने कहा, “केयरगीवर्स और मदर्स ने चुनौतियों का सामना करने के लिए कदम बढ़ाया और यह सुनिश्चित किया कि लॉकडाउन के कारण बच्चे मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित न हों। मदर्स और केयरगीवर्स के लिए यह एक कठिन समय था क्योंकि उनमें से कई ने या तो अपनी नौकरी खो दी या कई को अपने वेतन में कमी का सामना करना पड़ा। रोजगार खत्म हो जाने के कारण महिलाओं को महामारी के बाद काम करने के लिए तैयार करने के लिए कौशल प्रदान करने और कौशल को निखारने की आवश्यकता है। हम एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज ऑफ इंडिया में महिलाओं और लड़कियों को कौशल प्रदान करने और उनके कौशल को निखारने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, ताकि हम उन्हें बेहतर रोजगार के अवसरों के लिए तैयार कर सकें। इसके अलावा, हम केयरगीवर्स को सशक्त बनाने की अपनी पहल पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

       डेलॉइट इंडिया की पार्टनर सुश्री नीरू आहूजा ने महिलाओं को अपनी रचनात्मकता को सामने लाने और व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया। सुश्री आहूजा के पास टैक्स इंडस्ट्री में 25 वर्षों का अनुभव है। उन्होंने कहा, “महिलाएं शर्मीली और विनम्र होती हैं। हमें और अधिक बोलने और अपने विचारों को अपने वरिष्ठों के साथ साझा करने की आवश्यकता है।” सुश्री आहूजा का मानना ​​​​है कि महिलाएं पैरेंटिंग के माध्यम से महत्वपूर्ण कौशल हासिल करती हैं जो उन्हें कार्यालय में भी अग्रणी बनाती हैं। “माताएँ कार्यस्थल पर कौशल का प्रदर्शन करती हैं, चाहे वह प्रतिभा का पोषण करना हो, बजट का प्रबंधन करना हो, बहु-कार्य करना, संसाधनशीलता आदि हो। कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें महिलाएं स्वाभाविक रूप से अच्छी होती हैं और हमें अपनी ताकत को और मजबूत करने की आवश्यकता होती है। लेकिन एक क्षेत्र जिसमें हम सभी को सुधार करने की जरूरत है, वह है अपने विचार के बारे में अधिक मुखर होना।

        एसओएस मदर सुश्री श्यामा जैन ने एक महिला और एक एसओएस मदर के रूप में अपनी यात्रा के बारे में बात की। सुश्री श्यामा ने एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज में 33 साल बिताए हैं। उन्होंने शिक्षा और आपसी सम्मान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने 40 बच्चों की परवरिश की, जिनमें से अधिकांश अच्छी तरह से सेटल हो गए, जबकि कुछ बच्चे अभी भी पढ़ रहे हैं। एक एसओएस मदर के रूप में, सुश्री श्यामा ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी परवरिश के दौरान लड़के और लड़कियों के बीच कोई अंतर न रहे। इसके अलावा, सुश्री श्यामा ने लैंगिक असमानता को कम करने के लिए व्यवहार में परिवर्तन के महत्व पर बल दिया।

       केयरगीवर, सुश्री चंद्रम्मा ने उन चुनौतियों के बारे में बात किया, जिनका सामना एक बच्चे और एक महिला के रूप में उन्होंने किया जिसने उन्हें उन महिलाओं के लिए व्यावहारिक समाधान खोजने में मदद करने के लिए तैयार किया, जो उन्हें परिवार सुदृढ़ीकरण कार्यक्रम के तहत हासिल हुई। वह छह भाषाएं जानती हैं, जो उन्हें लोगों से तेजी से और बेहतर तरीके से जुड़ने में मदद करती हैं। वह 2014 से एक स्वयं सहायता समूह का हिस्सा रही हैं, और उन्होंने 68 परिवारों को आत्मनिर्भरता के लिए सशक्त बनाया है। उनका अपना जीवन निरंतर संघर्षपूर्ण रहा है। 8 महीने पहले उनके पति का देहांत हो गया था। उनका बेटा सातवीं कक्षा में पढ़ता है। उन्हें अपने अधिकांश जीवन के दौरान न्यूनतम मदद ही मिली, जिसके कारण वह कमजोर महिलाओं और उनके बच्चों के संकट को समझती हैं। 2014 में एसओएस चिल्ड्रेन्स विलेजेज ऑफ इंडिया के फैमिली स्ट्रेंथनिंग प्रोग्राम के साथ शुरू हुई उनकी सशक्तिकरण की यात्रा अब रंग ला रही है, जिससे वे कई लोगों के लिए बदलाव की राजदूत बन गई हैं।

      श्री सुमंता कर ने पैनल चर्चा का समापन यह कहते हुए किया कि यदि व्यक्तिगत स्तर पर व्यवहार परिवर्तन शुरू किया जाए तो दीर्घकालिक आधार पर लैंगिक समानता हासिल की जा सकती है। उन्होंने कहा, “लड़कियों को शिक्षा और कौशल से लैस करना महत्वपूर्ण है; साथ ही, लड़कों में महिलाओं और लड़कियों के लिए सम्मान पैदा करना महत्वपूर्ण है।

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